जब भगवान ने भक्त के लिए बनाई रसोई | मणिराम दास जी महाराज |

बहुत साल पहले की बात है। एक आलसी लेकिन भोलाभाला युवक था रामदास। दिन भर कोई काम नहीं करता बस खाता ही रहता और सोता रहता। घर वालों ने कहा चलो जाओ निकलो घर से, कोई काम धाम करते नहीं हो बस पड़े रहते हो। वह घर से निकल कर यूं ही भटकते हुए एक आश्रम पहुंचा। वहां उसने देखा कि एक महंत जी हैं उनके शिष्य कोई काम नहीं करते बस मंदिर की पूजा करते हैं।

उसने मन में सोचा यह बढिया है कोई काम धाम नहीं बस पूजा ही तो करना है। महंत जी के पास जाकर पूछा, क्या मैं यहां रह सकता हूं, महंत जी बोले हां, हां क्यों नहीं?

लेकिन मैं कोई काम नहीं कर सकता हूं

महंत जी : कोई काम नहीं करना है बस पूजा करना होगी

राम दास : ठीक है वह तो मैं कर लूंगा …

अब रामदास जी आश्रम में रहने लगे। ना कोई काम ना कोई धाम बस सारा दिन खाते रहो और प्रभु मक्ति में भजन गाते रहो।

हंसते खाते हुवे आज १५, दिन हो गया एक पच्छ बीत गया ।फिर एक दिन आई एकादशी। उसने रसोई में जाकर देखा खाने की कोई तैयारी नहीं। उसने महंत जी से पूछा आज रसोई नहीं बनेगी क्या

महंत जी ने कहा नहीं आज तो एकादशी है तुम्हारा भी उपवास है ।

उसने कहा नहीं अगर हमने उपवास कर लिया तो कल की द्वादशी का दिन ही नहीं देख पाएंगे हम तो …. हम नहीं कर सकते उपवास… हमें तो भूख लगती है आपने पहले क्यों नहीं बताया?

महंत जी ने कहा ठीक है तुम ना करो उपवास, पर खाना भी तुम्हारे लिए कोई और नहीं बनाएगा तुम खुद बना लो।

मरता क्या न करता

गया रसोई में, महंत जी फिर आए और बोले ! ”देखो अगर तुम रसोई बना लो तो राम जी को भोग जरूर लगा लेना और नदी के उस पार जाकर बना लो रसोई।

ठीक है, लकड़ी, आटा, तेल, घी, सब्जी लेकर रामदास महाराज चले गए, जैसा तैसा खाना भी बनाया, खाने लगा तो याद आया महंत जी ने कहा था कि राम जी को भोग लगाना है।
अब कभी जीवन में भोग तो लगाए नही थे-
सो महराज जैसा मन में आया उसी भाव से भोग लगाने लगे —
और बड़े ही श्रद्धा भक्ति उमंग उत्साह के भजन गुनगुनाने लगे।
भजन गाने लगे —
राजा राम आईए, प्रभु राम आईए, आके प्रेम से भोग लगाइए

प्रभु राम आइए, श्रीराम आइए मेरे भोजन का भोग लगाइए…..

कोई ना आया, तो बैचैन हो गया कि यहां तो भूख लग रही है और राम जी आ ही नहीं रहे।बेचारा भोला भाला रामदास जानता ही नहीं था कि प्रभु साक्षात तो आएंगे नहीं । पर महंत जी की बात मानना जरूरी है। फिर उसने कहा , देखो प्रभु राम जी, मैं समझ गया कि आप क्यों नहीं आ रहे हैं। मैंने रूखा सूखा बनाया है और आपको तर माल खाने की आदत है इसलिए नहीं आ रहे हैं…. तो सुनो प्रभु जी… आज वहां भी कुछ नहीं बना है, सबका एकादशी व्रत है, पाना हो तो यह भोग ही पा लो…

हमारे मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राघवेन्द्र सरकार जी अपने भक्त की सरलता पर बड़े मुस्कुराए और लाडली श्री किशोरी के साथ प्रकट हो गए। भक्त असमंजस में। महंत जी ने तो कहा था कि राम जी आएंगे पर यहां तो इनके साथ श्री किशोरी जी भी आईं है और मैंने तो भोजन बस दो लोगों का बनाया हैं। चलो कोई बात नहीं आज इन्हें ही खिला देते हैं।

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बोला प्रभु मैं भूखा रह गया लेकिन मुझे आप दोनों को देखकर बड़ा अच्छा लग रहा है लेकिन अगली एकादशी पर ऐसा न करना पहले बता देना कि कितने जन आ रहे हो, और हां थोड़ा जल्दी आ जाना। राम जी उसकी बात पर बड़े मुदित हुए। प्रसाद ग्रहण कर के चले गए। अगली एकादशी तक यह भोला भाला रामदास सब भूल गया। उसे लगा प्रभु ऐसे ही आते होंगे और प्रसाद ग्रहण करते होंगे।

फिर एकादशी आई। महंत जी से कहा, मैं चला अपनी रसोई बनाने पर महंत जी थोड़ा ज्यादा अनाज लगेगा, वहां दो लोग आते हैं। गुरुजी मुस्कुराए, भूख के मारे बावला है। ठीक है ले जा और अनाज लेजा।

अबकी बार उसने तीन लोगों की रसोई बनाई। फिर गुहार लगाई

प्रभु राम आइए, सीताराम आइए, मेरे भोजन का भोग लगाइए…

प्रभु की महिमा भी निराली है। भक्त के साथ कौतुक करने में उन्हें भी बड़ा मजा आता है। इस बार वे अपने भाई लक्ष्मण, भरत शत्रुघ्न और हनुमान जी को लेकर आ गए। भक्त को चक्कर आ गए। यह क्या हुआ। एक का भोजन बनाया तो दो आए और आज तीन लोगों के लिए रसोई बनाई तो पूरा खानदान आ गया। लगता है आज भी भूखा ही रहना पड़ेगा। सबको भोजन के लिए थाल लगाया। सब लोग पाने लगे और बेचारा रामदास बैठे-बैठे सबको देखता रहा। अनजाने में ही उसकी भी एकादशी हो गई।

फिर अगली एकादशी आने से पहले महंतजी से कहा, महंत जी, ये आपके प्रभु राम जी, अकेले क्यों नहीं आते हर बार कितने सारे लोग ले आते हैं? इस बार अनाज ज्यादा देना। महंत जी को लगा, कहीं यह अनाज बेचता तो नहीं है देखना पड़ेगा जाकर। महंत जी ने भंडार में जाकर कहा इसे जितना अनाज चाहिए दे दो और छुपकर उसे देखने चल पड़े।

इस बार रामदास ने सोचा, आज रसोई पहले नहीं बनाऊंगा, पता नहीं कितने लोग आ जाएं। पहले बुला लेता हूं फिर बनाता हूं।

फिर टेर लगाई प्रभु राम आइए , श्री राम आइए, मेरे भोजन का भोग लगाइए…

सारा राम दरबार मौजूद… इस बार तो हनुमान जी भी साथ आए लेकिन यह क्या प्रसाद तो तैयार ही नहीं है। भक्त ठहरा भोला भाला, बोला प्रभु इस बार मैंने रसोई नहीं बनाया, प्रभु ने पूछा क्यों? बोला, मुझे मिलेगा तो है नहीं फिर क्या फायदा बनाने का, आप ही बना लो और खुद ही पा लो….

राम जी मुस्कुराए, श्री किशोरी जी भी गदगद हो गई उसके मासूम जवाब से… लक्ष्मण जी बोले क्या करें प्रभु…

प्रभु बोले भक्त की इच्छा है पूरी तो करनी पड़ेगी। चलो लग जाओ सेवा में । लक्ष्मण जी ने लकड़ी उठाई, श्री किशोरी जी आटा गूथने लगीं। भक्त एक तरफ बैठकर देखता रहा। माता सीता रसोई बना रही थी तो कई ऋषि-मुनि, यक्ष, गंधर्व प्रसाद लेने आने लगे। इधर महंत जी ने देखा रसोई तो बनी नहीं भक्त रामदास एक कोने में बैठा है। महंत जी ने पूछा बेटा रामदास क्या बात है तुमने रसोई क्यों नहीं बनाया?
तब रामदास —–
बोला, अच्छा किए गुरुजी आप आ गए देखिए कितने लोग आते हैं प्रभु के साथ…..

गुरुजी बोले, मुझे तो कुछ नहीं दिख रहा तुम्हारे और अनाज के सिवा

भक्त रामदास ने माथा पकड़ लिया, एक तो इतनी मेहनत करवाते हैं प्रभु, भूखा भी रखते हैं और ऊपर से महंत जी को दिख भी नहीं रहे यह और बड़ी मुसीबत है।
तब रामदास ने
प्रभु से कहा, आप गुरुजी को क्यों नहीं दिख रहे हैं?

प्रभु जी बोले : मैं उन्हें नहीं दिख सकता।

बोला : क्यों , वे तो बहुत बड़े आश्रम के श्री महंत है बड़े पंडित हैं, ज्ञानी हैं विद्वान हैं उन्हें तो बहुत कुछ आता है उनको क्यों नहीं दिखते आप?

राम जी बोले , माना कि उनको सब आता है पर वे सरल नहीं हैं तुम्हारी तरह। इसलिए उनको नहीं दिख सकता….

रामदास ने महंत जी से कहा, महंत जी! प्रभु कह रहे हैं आप सरल नहीं है इसलिए आपको नहीं दिखेंगे, गुरुजी रोने लगे वाकई मैंने सबकुछ पाया पर सरलता नहीं पा सका तुम्हारी तरह, और प्रभु तो मन की सरलता से ही मिलते हैं।
निर्मल मन जन सो मोहि पावा।
मोहि कपट छल छिद्र न भावा।।
भक्तवत्सल मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राघवेन्द्र सरकार जी प्रकट हो गए और महंत जी को भी दर्शन दिए। इस तरह एक भक्त के कहने पर प्रभु ने रसोई भी बनाई। यह भक्ति कथा लोकश्रुति पर आधारित है।
🙏🏻 आप सभी लोगों के स्नेह प्रेम और गुरुजनों के आशीर्वाद का आकांछी— दासानुदास– मणिराम दास
संगीतमय श्री राम कथा श्रीमद् भागवत कथा एवं श्रीमद् प्रेम रामायण महाकाव्य जी की कथा के सरस गायक–
संस्थापक/अध्यक्ष- श्री सिद्धि सदन परमार्थ सेवा संस्थान एवं ज्योतिष परामर्श केंद्र श्री धाम अयोध्या जी
संपर्क सूत्र–6394614812/9616544428

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